1-भाषा
भाषा अपने मन के भावों तथा विचारों को बोलकर, लिखकर या पढ़कर प्रकट करने का माध्यम है।
भाषा के प्रकार :-
भाषा मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं; ये निम्नलिखित हैं -
(क) मौखिक भाषा
(ख) लिखित भाषा
(क) मौखिक भाषा :-
जब हम अपने भावों तथा विचारों को बोलकर प्रकट करते हैं, तो उसे मौखिक भाषा कहते हैं; जैसे – फिल्में, गाने आदि।
(ख) लिखित भाषा :-
भाषा का वह रूप जिसमें लिखकर या पढ़कर विचारों को प्रकट किया जाए, उसे लिखित भाषा कहते हैं; जैसे – पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ, अखबार आदि लिखित भाषा के उदाहरण हैं।
सांकेतिक भाषा :-
कभी-कभी हम संकेत के माध्यम से भी अपने भावों को प्रकट करते हैं; जैसे – मुँह पर अंगुली रखने का अर्थ चुप रहना होता है, चौराहे पर ट्रैफिक हवलदार द्वारा दिए गए संकेत। इस प्रकार की भाषा को सांकेतिक भाषा कहते हैं। परंतु संकेतों द्वारा हर भाव या विचार को प्रकट नहीं किया जा सकता। इसलिए इस प्रकार की भाषा को महत्व नहीं दिया जाता।
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2- हिंदी भाषा का उदभव और विकास
आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते हैं, वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है। संस्कृत के दो रूप थे – एक साधारण बोलचाल की भाषा थी जिसे लौकिक संस्कृत कहते थे। इसकी भाषा साफ-सुथरी तथा परिस्कृत नहीं थी। दूसरी भाषा थी वैदिक संस्कृत जो साहित्य की भाषा थी। आगे चलकर धीरे-धीरे जन भाषा (लौकिक भाषा) ने साहित्य का रूप ले लिया तथा वैदिक भाषा (संस्कृत) लुप्त हो गई। भाषा के इस बदले हुए रूप को ‘पाली’ कहा गया। इसी प्रकार भाषा परिवर्तित होकर प्राकृत हो गई। भाषा के इस निरन्तर बदलाव के कारण ही प्राकृत भाषा के बाद अपभ्रंश साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का जन्म हुआ। लगभग तेरहवीं शताब्दी में एक साहित्यिक भाषा के रूप में हिन्दी भाषा का जन्म हुआ।
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3-बोली
जब कोई भाषा किसी विशेष क्षेत्र में बोली जाती है, तो उसे बोली कहते हैं। बोली विकसित होकर (आगे चलकर) साहित्य की भाषा बन जाती है।
भाषा और बोली में अन्तर :-
सामान्यत: भाषा औऱ बोली में कुछ विशेष अन्तर नहीं है। दोनों एक ही जैसे लगते हैं। बोली एक क्षेत्र में बोली जाती है और भाषा का क्षेत्र बड़ा होता है; जैसे – हिन्दी हमारे देश की भाषा है और अवधी एक क्षेत्र की भाषा है इसलिए यह बोली है।
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4-लिपि :-
ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, वही लिपि कहलाती है। लिपि का अर्थ होता है किसी भी भाषा को लिखने की प्रणाली या लिखावट।
नीचें कुछ भाषाओं के तथा उनकी लिपियों के नाम दिए जा रहे हैं -
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भाषा |
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लिपि |
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(क) |
हिन्दी |
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देवनागरी |
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(ख) |
अंग्रेजी |
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रोमन |
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(ग) |
उर्दू, फ़ारसी |
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अरबी |
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(घ) |
रूसी |
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क्रिलिक |
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5-साहित्य
किसी भी भाषा के लिखित रूप को साहित्य कहते हैं; जैसे – कविता, कहानी, नाटक आदि। किसी भी भाषा के कुछ विशेष ज्ञान को लोगों तक पहुँचाने या अपनी आगे की पीढ़ियों के लिए ज्ञान सम्बंधी बातों को सम्भालकर रखने के लिए साहित्य की आवश्यकता पड़ती है।
साहित्य की विद्या :-
अपनी बात को कहने या प्रस्तुत करने का हर किसी का अपना एक अलग ढ़ंग होता है। अपनी बात को प्रस्तुत करने के इसी ढ़ंग को साहित्य की विधा अथवा शैली कहते हैं। ये विद्याएँ दो प्रकार की होती हैं -(1) पद्य
(2)गद्य
(1) पद्य :-
पद्य का अर्थ कविता से है। नीचे आपके पाठ्य पुस्तक ‘वसंत’ के पाठ ‘चाँद से थोड़ी-सी गप्पें’ से कुछ काव्य पंक्तियाँ दी गई हैं -
गोल हैं खूब मगर
आप तिरछें नज़र आते हैं ज़रा।
आप पहने हुए हैं कुल आकाश
तारों-जड़ा।
यहाँ कवि ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए जिस ढंग का प्रयोग किया है, उसे हम पद्य शैली कहते हैं। इसी प्रकार कबीर के दोहे, रहीम के दोहे तुलसीदास के दोहे, सोरठे, चौपाइयाँ, छंद आदि सभी पद्य शैली के उदाहरण हैं। इसमें लय व गेयता होती है।
(2)गद्य :-
ऊपर लिखे गए पंक्तियों को हम इस प्रकार भी लिख सकते हैं -
चाँद का आकार गोल है, लेकिन थोड़ा-सा तिरछा है। आप तारों से जड़े हुए आकाश को पहने हुए प्रतीत हो रहे हैं।
अपने मनोभावों को कहने के इस ढ़ंग को गद्य शैली कहा जाता है। इसी प्रकार कहनियाँ, लेख, उपन्यास, पत्र, जीवनी, संस्मरण तथा रेखाचित्र गद्य शैली के अन्तर्गत आते हैं।
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6- व्याकरण
प्रत्येक भाषा को बोलने तथा लिखने का अपना एक नियम होता है। किसी भी भाषा को व्याकरण के द्वारा शुद्ध रूप में बोला और लिखा जा सकता है। व्याकरण से हमें यह ज्ञात होता है कि कौन से शब्द को कहाँ और क्यों रखना चाहिए। किसी भी वाक्य की रचना के लिए कर्ता+ कर्म+ क्रिया का होना आवश्यक है।
| मैं | पुस्तक | पढ़ता हूँ। |
| कर्ता | कर्म | क्रिया |
यहाँ मैं कर्ता है, पुस्तक कर्म है तथा पढ़ता हूँ क्रिया है। कुछ ऐसे वाक्य भी होते हैं जहाँ कर्म का लोप हो जाता है। जैसे -
| मैं | जाऊँगा। |
| कर्ता | क्रिया |
यहाँ ‘मैं’ कर्ता है तथा ‘जाऊँगा’ क्रिया है।
| मैं | खाऊँगा। |
| कर्ता | क्रिया |
यहाँ ‘मैं’ कर्ता है तथा ‘खाऊँगा’ क्रिया है।
यदि हम भाषा में व्याकरण के नियमों का पालन नहीं करेंगे तो हम शुद्ध रूप में भाषा को बोल या लिख नहीं पाएँगे।
जैसे – यह मेरा बहन है।
यह भाषा का अशुद्ध रूप है। यहाँ शुद्ध रूप – ‘यह मेरी बहन है’ होगा । व्याकरण के तीन मुख्य भाग होते हैं -
(क) वर्ण-विचार
(ख) शब्द-विचार
(ग) वाक्य-विचार